सनातन धर्म में हरिशयनी एकादशी का विशेष महत्व है। इसे देवशयनी एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में राजा मान्धाता के राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। वर्षा न होने से प्रजा दुखी हो गई। राजा ने ऋषि अंगिरा से इसका कारण पूछा। ऋषि ने बताया कि राज्य में धर्म का ह्रास हुआ है, इसलिए यह संकट आया है। उन्होंने राजा और प्रजा को हरिशयनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।
राजा मान्धाता ने पूरे राज्य के लोगों के साथ श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु की पूजा की और हरिशयनी एकादशी का व्रत रखा। व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। शीघ्र ही राज्य में अच्छी वर्षा हुई, खेत लहलहा उठे और प्रजा सुखी हो गई।
तभी से यह मान्यता है कि हरिशयनी एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है, सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। यह दिन भक्ति, संयम और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
न्यूज डेस्क। बिंदास पलामू

